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आखिरी अल्फाज़

Kulbhushan Choudhary

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब भी मैं सुबह सवेरे सुंदर किनारे आता हूं,
        
                                                    
                            
तुम्हारे अल्फाजों की गूंज सुनकर मैं घबरा जाता हूं,
लोगों के लिए होगी ये सुहानी सुबह,
मेरे लिए तो है ये एक तूफानी सुबह,
याद है मुझे
उस दिन भी समुद्र इसी तरह शांत था,
कहीं दूर से मछुआरों के गाने की मधुर ध्वनि कानों को भली लग रही थी,
और हम किनारे पड़ी डोंगी पर सवार हो,
निकल पड़े समुंद्र की सैर को,
न जाने शांत समुद्र कैसे अशांत हुआ,
ऊंची ऊंची लहरों में डोंगी हिचकोले खाने लगी,
संभालना मुश्किल हो गया, और
अगले ही क्षण कोशिश के बावजूद मैं तुम्हारा हाथ भी न पकड़ सका,
बचाओ बचाओ की आवाजें ही रह गई,
समुद्र भी अचानक शांत हो गया,
अभी तक नहीं समझा क्या हो गया,
बस तुम्हारे आखिरी अल्फाज आज भी कानों में चीत्कार मचाते हैं,
जो रह रह कर अंदर हलचल मचाते हैं,
अक्सर मेरे पांव मुझे जबरन इधर खीच लाते हैं,
और मछुआरों का संगीत आज भी गूंज रहा है,
मगर आज वो आनंद नहीं
एक हलचल मचा रहा है,
अक्सर आता हूं ये जानने के लिए,
कि उस दिन ऐसा क्या हुआ था,
ए समुद्र तू ही बता,
तू उस दिन इतना अशांत क्यों हुआ था,
मेरा सब कुछ छीनकर तुझे क्या मिला था, क्या मिला था.
-कुल भूषण 
3 वर्ष पहले
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