वन्दिशों की वेदना में, लग रही वो गैर की है।
चाहनें से क्यों मिले गी, चाहतें भी गैर की है।।
चल दिए वो पा इशारा, है यही उनकी भी मर्जी।
बे वज़ह मेरी इज़ाज़त, मानती वो गैर की है।।
चाह उनकी जिन्दा रहूं मैं, सिर्फ उनके ही लिए।
रोज़ मर के जी रहा हूं, मर्जी बनीं अब गैर की है।।
आंख में आंखों को डाले, ढूंढ़ती ये क्या निगाहें।
ये नज़र जिन पर नज़र है,उन पर नज़रअब गैर की है।।
खौफ़ चेहरे पर लिए हैं,बे खौफ़ क्यों कर हो रहे।
बन लूटेरा जग खड़ा है, लूटता ये गैर की है।।
जो बचा कुछ रह गया तो, है वही उनका वजूद।
आंधियां गर ले उड़े वो, गर्दिशें जो गैर की है।।
खैरियत भी क्या कहें हम, खैरख्वाहों के लिए।
कद्रदानों में भटकती,कद्र भी अब गैर की है।।
लाख कोशिश हम करें, फिर भी बनें ना कोई बात।।
मुस्कुराना गुनगुनाना भी,बता क्या गैर की है।।
हौसला रख उठ गये पग, हो समर्पित तन व मन से।
ज़लज़ला भी आ गया तो, त्रासदी भी गैर की है।।
वन्दगी की याचना ले,सिर झुके जो तू मिले तो।
देख नज़रों में करिश्मा, वन्दगी ना गैर की है।।
इन्तजारी की घड़ी ये, काट लो धीरज को धर कर।
वन्दिशें भी टूटती हैं, जो लगी ये गैर की है।।
आंख गीली ना करो ये,सब्र से तो काम ले लो।
नाम ले लो राम का, फिर मिटें गी वन्दिशें जो गैर की है।।
-कृष्ण मुरारी पाण्डेय