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मन्चस्थ कवि:-

krishna murari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हंसते -हंसते आये तुम,
        
                                                    
                            
लोट -पोट हरषाये तुम।
चंचल श्वासें विह्वल आंखें,
सौरभ खूब लुटाये तुम।१।

नन्दगांव बरसानें तुम,
गोपी गोकुल जानें तुम।
पुलवामा से डोकलाम तक,
सब पर नज़र गड़ाये तुम।२।

देव वही जो सविता भी है,
शक्ति संचयी कविता भी है।
बही लेखनी चारु भाव में ,
सरस सरल ढलकाये तुम।३।

शासन और कुशासन दृष्टि,
दुर्गम विरल हुताशन सृष्टि।
मत वैभिन्न स्वरचित बीन से,
अपनी राग सुनाये तुम।४।

लोभ मोह भ्रमजाल सरीखे,
काम क्रोध वाचाल सलीके।
जात- पात और छुवाछूत सब,
अलग थलग विलगाये तुम।५।

कृष्ण मुरारी पाण्डेय
रिसिया (बहराइच)।
मो०नं०:-८८८७६०१७२३.
3 वर्ष पहले
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