विज्ञापन

जीवन संध्या

kavyanshi srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            त्वरित वेग विद्युत घन वर्षा
        
                                                    
                            
उज्ज्वल अंबुज सीधी रेखा
अनंत अभ्र दुख से भीगा
मौन दिवाकर अस्ताचल में डूबा

शून्य संध्या कलरव भी फीका
अंतिम दिवस नारंगी झोंका
हृदय ने विषपान किया
पाषाणों ने अभिमान किया

नहीं मूर्त कोई भी अपना
प्रस्तर सामान कठोर बना
सब सच्चा झूठा नाता
विकल हृदय का कोना कोना।


कब तक संध्या की प्रतीक्षा
प्रतिक्षण लेती व्यथा परीक्षा
अहंकार का अंत नहीं
सहानभूति शब्द नहीं

शून्य स्मरण सुख की डोली
आई हिस्से दुख की झोली
मरू बने सावन के कानन
कब तक गुंजित अलि के झुंड।

संध्या है वेदना या शर्वरी की दस्तक
सुख प्रस्तावना या जीवन अंत
बसंत बयार या पतझड़ का शूल
तिमिर परिमल या अमावस की काली रात।
-काव्यांशी श्रीवास्तवा
 
20 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12711 कविताएं

View Profile

Vijay BindaasRaja

192 कविताएं

View Profile