त्वरित वेग विद्युत घन वर्षा
उज्ज्वल अंबुज सीधी रेखा
अनंत अभ्र दुख से भीगा
मौन दिवाकर अस्ताचल में डूबा
शून्य संध्या कलरव भी फीका
अंतिम दिवस नारंगी झोंका
हृदय ने विषपान किया
पाषाणों ने अभिमान किया
नहीं मूर्त कोई भी अपना
प्रस्तर सामान कठोर बना
सब सच्चा झूठा नाता
विकल हृदय का कोना कोना।
कब तक संध्या की प्रतीक्षा
प्रतिक्षण लेती व्यथा परीक्षा
अहंकार का अंत नहीं
सहानभूति शब्द नहीं
शून्य स्मरण सुख की डोली
आई हिस्से दुख की झोली
मरू बने सावन के कानन
कब तक गुंजित अलि के झुंड।
संध्या है वेदना या शर्वरी की दस्तक
सुख प्रस्तावना या जीवन अंत
बसंत बयार या पतझड़ का शूल
तिमिर परिमल या अमावस की काली रात।
-काव्यांशी श्रीवास्तवा
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