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सूना शिवाला

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                            भटकते हुए मन का सूना शिवाला,
        
                                                    
                            
न खंडित हुआ है, न पूजित हुआ है।
भटकते हुए मन का सूना शिवाला,
न खंडित हुआ है, न पूजित हुआ है।

कहे ज्ञान, वैराग्य की इस डगर पर,
तपस्या का सूरज पिघलना ही उत्तम।
कहे प्रेम, इस साधना के भँवर में,
हृदय की चिता पर मचलना ही उत्तम।
इसी द्वंद्व में आंसुओं का समंदर,
न शोषित हुआ है, न संचित हुआ है।
भटकते हुए मन का सूना शिवाला,

न खंडित हुआ है, न पूजित हुआ है।
जहाँ प्राण की धड़कनें मौन साधे,
प्रतीक्षा नये शूल चुभना सिखाए।
जहाँ देह की हर व्यथा गीत बनकर,
किसी अजनबी सी छुअन गुनगुनाए।
वहीं श्वास का काँपता सा परिंदा,
न मूर्छित हुआ है, न स्पंदित हुआ है।
भटकते हुए मन का सूना शिवाला,
न खंडित हुआ है, न पूजित हुआ है।

नदी जो समंदर की बाहों में जाकर,
अमर प्रेम का आचमन कर रही हो।
धरा जो गगन के सघन आलिंगन में,
स्वयं को मिटाकर सृजन कर रही हो।
मगर विरह का यह अभागा मुसाफ़िर,
न विस्मृत हुआ है, न चर्चित हुआ है।
भटकते हुए मन का सूना शिवाला,
न खंडित हुआ है, न पूजित हुआ है।

किसे ज्ञात है इस नगर की गली में,
कहाँ मृत्यु वरमाल लेकर खड़ी है।
किसे ज्ञात है प्राण की भस्म के तल,
निरंतर सुलगती अगन की झड़ी है।
इसी से हृदय का अकिंचन समर्पण,
न वर्जित हुआ है, न अर्पित हुआ है।
भटकते हुए मन का सूना शिवाला,
न खंडित हुआ है, न पूजित हुआ है।

- भानु शर्मा 'रंज'
4 घंटे पहले
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