मूरत तो गढ़ ली सोने की, लेकिन उसमें प्राण नहीं है
शब्दों के अम्बार लगे हैं, पर कोई मधुगान नहीं है
हमने नाप लिए हैं अंबर
सागर के सब नाप लिए तल
चीर पहाड़ों का सीना भी
ढूँढ निकाला भीतर का जल
बना लिए हैं महल गगन में
चाँद तलक है मार हमारी
पर पड़ोस के सूनेपन की
पीर न हमने कभी विचारी।
भीड़ बहुत है आज जगत में
दौड़ रहे सब अंधी धुन में
अंतर के सूने आँगन में, कोई भी मेहमान नहीं है
मूरत तो गढ़ ली सोने की, लेकिन उसमें प्राण नहीं है
हम अंधी दौड़ों में पड़कर
अपने आप से दूर हुए हैं
सुख की खोज में दर-दर भटके
लेकिन भीतर चूर हुए हैं
रिश्तों के मेले में हमने
अपनापन व्यापार किया है
अपनों की छाती पर चढ़ कर
सपनों को साकार किया है
महँगे वस्त्रों से हमने तन
ढँक तो लिया चमक से लेकिन
नग्न खड़ी है रूह हमारी, शील का परिधान नहीं है
मूरत तो गढ़ ली सोने की, लेकिन उसमें प्राण नहीं है
कागज़ के फूलों में हम सब
ढूँढ रहे हैं गंध चमन की
झूठी तालियों में खो गई
आवाज़ें अब अंतर्मन की
सत्य अहिंसा और धरम सब
बिकते आज यहाँ कौड़ी में
न्याय खड़ा है नतमस्तक हो
सत्ता की जंजीर-कड़ी में
दौलत के ऊँचे शिखरों पर
बैठ गए हम आज मुकुट धर
किन्तु नींव के उस पत्थर का, हमको कोई ध्यान नहीं है
मूरत तो गढ़ ली सोने की, लेकिन उसमें प्राण नहीं है
-भानु शर्मा रंज