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गूँज रहा है शोर जगत में, लेकिन मौन बड़ा गहरा है।

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                            गूँज रहा है शोर जगत में, लेकिन मौन बड़ा गहरा है।
        
                                                    
                            

स्वर्ण-रचित महलों में हमने,
सुख की सारी सेज बिछाई
माया के व्यापार में रमने,
मिट्टी की औकात भुलाई
भूल गए हम उस माटी को,
जिसके भीतर खो जाना है
छोड़ चले हम उस घाटी को,
जहाँ लौट कर फिर आना है
जीत लिया है सब कुछ हमने,
प्रकृति के हर एक बंधन से पर

अहंकार के इस पिंजरे में, आत्मा का पंछी ठहरा है।
गूँज रहा है शोर जगत में, लेकिन मौन बड़ा गहरा है।

ज्ञान-ध्यान की बातें करते,
हम तो ज्ञानी कहलाते हैं
किन्तु सत्य के पथ पर चलते,
कदम हमारे थर्राते हैं
बाहर से तो साधु बने हम,
पावन सबको कर जाते हैं
भीतर पाले विष के सर्प हम,
कदम-कदम पर भरमाते हैं
दर्शन तो बस रह गया अब,
शास्त्रों और पुराणों में ही

मुरली की वो तान खो गई, अब तो नागों का पहरा है।
गूँज रहा है शोर जगत में, लेकिन मौन बड़ा गहरा है।

मैं-मेरा की इस उलझन में,
हम क्या से क्या बन बैठे हैं
सुख की झूठी इस छुअन में,
स्वयं से ही हम ठन बैठे हैं
साँसों की ये डोरी जलती,
नित बढ़ती जाती है माया
धूप उम्र की हरदम ढलती,
दिन-दिन घटती जाती काया
राजा हो या रंक भिखारी,
सबको माटी में मिलना, पर

तृष्णा के इस महासमर में, जीवन घायल ठहरा है।
गूँज रहा है शोर जगत में, लेकिन मौन बड़ा गहरा है।
-भानु शर्मा रंज
 
3 घंटे पहले
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