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मुखौटे

Kapil Dev Julka

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस उदास बज़्म में,
        
                                                    
                            
हर चेहरा एक मुकम्मल पहेली है,
हँसती हुई ये आँखें जैसे,
ग़म की कोई पुरानी सहेली हैं।

जो लबों पर सजी है,
वह तबस्सुम तो बस एक गुज़ारिश है,
अंदर जो टूट चुका है,
वहाँ अश्कों की लावारिस बारिश है।

लोग मिलते हैं, गले लगाते हैं,
मगर दिलों के दरमियाँ एक साया है,
इस दौर-ए-सियासत में सबने,
ज़ख़्मों पर हँसी का मख़मली पर्दा गिराया है।

कोई पूछे तो कह देते हैं 'सब ख़ैरियत है',
ये हुनर भी हमें इस वक़्त ने सिखाया है,
पर जो तन्हाई में सुलगता है,
वह धुआँ आज तक कोई छुपा नहीं पाया है।

इस बेमुरव्वत जहाँ का,
यही तो सबसे गहरा फ़साना है,
यहाँ ख़ुश दिखने के लिए भी,
एक नया दर्द रोज़ गले लगाना है।
-कपिल देव जुल्का
 
3 घंटे पहले
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