आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुखौटे

                
                                                         
                            इस उदास बज़्म में,
                                                                 
                            
हर चेहरा एक मुकम्मल पहेली है,
हँसती हुई ये आँखें जैसे,
ग़म की कोई पुरानी सहेली हैं।

जो लबों पर सजी है,
वह तबस्सुम तो बस एक गुज़ारिश है,
अंदर जो टूट चुका है,
वहाँ अश्कों की लावारिस बारिश है।

लोग मिलते हैं, गले लगाते हैं,
मगर दिलों के दरमियाँ एक साया है,
इस दौर-ए-सियासत में सबने,
ज़ख़्मों पर हँसी का मख़मली पर्दा गिराया है।

कोई पूछे तो कह देते हैं 'सब ख़ैरियत है',
ये हुनर भी हमें इस वक़्त ने सिखाया है,
पर जो तन्हाई में सुलगता है,
वह धुआँ आज तक कोई छुपा नहीं पाया है।

इस बेमुरव्वत जहाँ का,
यही तो सबसे गहरा फ़साना है,
यहाँ ख़ुश दिखने के लिए भी,
एक नया दर्द रोज़ गले लगाना है।
-कपिल देव जुल्का
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर