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मकानों के कद, दरख्तों के साए

Kapil Dev Julka

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब मकानों के कद्र बढ़े, तो दरख्तों के साए छोटे हो गए,
        
                                                    
                            
इस तरक्की के खेल में, हम अंदर से कितने खो गए।

लोहा मुस्कुराया बहुत, और पत्थर भी संवर गया,
पर वो जो मिट्टी का सोंधापन था, न जाने किधर गया।
ऊंची इमारतों ने छू तो लिया है आसमान को,
मगर सुकूँ छिन गया, परिंदों के उस आशियाने का।

चमकती सड़कों पर दौड़ती हैं गाड़ियां अब बेहिसाब,
मगर धूल में कहीं खो गया, वो मासूम सा एक ख्वाब।
कारखानों का धुंआ जब इन हवाओं में आ मिला,
सांसों की रवानी को भी, एक मीठा सा दर्द मिला।

ये कैसा उजाला है, जो अपने साथ अंधेरे लाता है,
बस्ती तो बस जाती है, पर अंदर का दिल उजड़ जाता है।
हाँ, तरक्की की राह में कुछ तो पीछे छूटेगा ही,
जब नया शीशा सजेगा, तो पुराना आईना टूटेगा ही।

राहें तो हमवार हुईं, और फासले भी सिमट गए,
पर अपनों की बाहों के, वो घेरे भी तो घट गए।
हुनरमंद हाथों पर अब मशीनों का कड़ा पहरा है,
तभी तो आज की इस हंसी में, ज़ख्म बेहद गहरा है।

अगर आगे बढ़ना है, तो ये कीमत भी चुकानी होगी,
तरक्की की हर एक दास्ताँ, थोड़ी दर्दभरी तो होगी।
-कपिल देव जुल्का
 
21 घंटे पहले
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