आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मकानों के कद, दरख्तों के साए

                
                                                         
                            जब मकानों के कद्र बढ़े, तो दरख्तों के साए छोटे हो गए,
                                                                 
                            
इस तरक्की के खेल में, हम अंदर से कितने खो गए।

लोहा मुस्कुराया बहुत, और पत्थर भी संवर गया,
पर वो जो मिट्टी का सोंधापन था, न जाने किधर गया।
ऊंची इमारतों ने छू तो लिया है आसमान को,
मगर सुकूँ छिन गया, परिंदों के उस आशियाने का।

चमकती सड़कों पर दौड़ती हैं गाड़ियां अब बेहिसाब,
मगर धूल में कहीं खो गया, वो मासूम सा एक ख्वाब।
कारखानों का धुंआ जब इन हवाओं में आ मिला,
सांसों की रवानी को भी, एक मीठा सा दर्द मिला।

ये कैसा उजाला है, जो अपने साथ अंधेरे लाता है,
बस्ती तो बस जाती है, पर अंदर का दिल उजड़ जाता है।
हाँ, तरक्की की राह में कुछ तो पीछे छूटेगा ही,
जब नया शीशा सजेगा, तो पुराना आईना टूटेगा ही।

राहें तो हमवार हुईं, और फासले भी सिमट गए,
पर अपनों की बाहों के, वो घेरे भी तो घट गए।
हुनरमंद हाथों पर अब मशीनों का कड़ा पहरा है,
तभी तो आज की इस हंसी में, ज़ख्म बेहद गहरा है।

अगर आगे बढ़ना है, तो ये कीमत भी चुकानी होगी,
तरक्की की हर एक दास्ताँ, थोड़ी दर्दभरी तो होगी।
-कपिल देव जुल्का
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
21 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर