दास्ताँ-ए-ख़ामोशी
बहुत से लफ़्ज़ जब आपस में टकरा कर बिखरते हैं,
तो उन बिखरे हुए लफ़्ज़ों के मलबे से,
ये भारी, ज़हरीली खामोशी जनम लेती है।
ये वो मोड़ है... जहाँ आवाज़ें दम तोड़ देती हैं,
और जज़्बात खुद को किसी बंद कमरे में कैद कर लेते हैं।
शुरुआत में...
बातें दरिया की तरह बहती थीं,
हम हर शिकवे को लफ़्ज़ों का लिबास पहनाते थे।
कभी लड़ते थे, कभी रूठते थे, कभी हंसते थे,
मगर कुछ न कुछ कहते ज़रूर थे।
क्योंकि तब तक उम्मीद ज़िंदा थी,
कि शायद कोई लफ़्ज़ दिल के पार उतर जाए,
शायद कोई जुमला बिगड़ी हुई बात बना जाए।
फिर धीरे-धीरे, लफ़्ज़ कम होने लगे।
बहस की जगह एक ठंडी सी रज़ामंदी ने ले ली।
और फिर एक दिन...
वह आख़िरी बात हुई, जो बहुत लंबी थी।
उस बात में सब कुछ कह दिया गया था—
वो सब भी, जो नहीं कहना चाहिए था,
और वो सब भी, जो सदियों से छुपा था।
उस आख़िरी तूफ़ान के बाद...
जो सन्नाटा पसरा, वो कोई आम सन्नाटा नहीं था।
वो एक ऐसी ख़ामोशी थी, जिसकी कोई सीमा नहीं थी।
यह खामोशी... मखमली भी थी और जानलेवा भी,
इसमें एक बेपरवाह बिंदासपन था, और रूह को चीरता हुआ दर्द भी।
अब हम एक ही आसमान के नीचे सांस लेते हैं,
मगर दोनों के बीच एक न दिखने वाली दीवार है।
तुम अपने सन्नाटे में महफ़ूज़ हो, मैं अपनी तन्हाई में मसरूफ़ हूँ।
अब न कोई गिला है, न कोई शिकवा, न कोई आरज़ू।
लोग कहते हैं कि वक्त हर घाव भर देता है,
मगर इस ख़ामोशी का कोई इलाज नहीं।
क्योंकि हम जानते हैं...
कि बहुत-सी बातों के बाद जो ये ख़ामोशी पैदा हुई है,
इसके पार जाने का कोई रास्ता नहीं है।
अब इस खामोशी के बाद...
हमारे बीच कभी कोई बात नहीं होगी।
बस एक अनकहा सा मलाल रहेगा,
और एक ख़ामोश सा सफ़र... जो ता-उम्र चलता रहेगा।
-कपिल देव जुल्का