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तेरी धड़कनों में बह रहा है जो सुकूँ ज़रा।

Kapil Dev Julka

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भटकता रहा उम्र भर जो गली-गली, सुन ज़रा,
        
                                                    
                            
वह रहबर तो आईने के उस पार खड़ा है, चुन ज़रा।

दुकान-ए-ज़िंदगी के सब तगादे बाहर छोड़ आ,
अपनी आँखों में छिपा बैठा है जो ख़्वाब, बुन ज़रा।

कोई और क्यों लिखेगा तेरी तक़दीर का सफ़्हा,
अपनी उँगलियों से अपनी ही क़िस्मत की धुन ज़रा।

शाम ढलने से पहले खुद से एक मुलाक़ात कर,
जो अक्स मुस्कुरा रहा है दर्पण में, उसे गुन ज़रा।

ये गिले-शिकवे, ये तन्हाइयाँ तो बस सराब हैं,
तू खुद अपनी ही महफ़िल का शब-ए-फ़ुनूँ ज़रा।

उसे ग़ैरों के लफ़्ज़ों में क्यों ढूँढता है बावरे,
तेरी धड़कनों में बह रहा है जो सुकूँ ज़रा।

उसी ने सँवारी हैं 'कपिल' तेरी उजड़ी हुई रातें,
जो आईने से झाँकता है, वह तेरा ही जनूँ ज़रा।
-कपिल देव जुल्का
 
एक दिन पहले
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