दिया तूने जो ग़म, वो मंज़ूर है,
तेरे फ़ैसले में ख़ता ही नहीं।
ग़म-ए-इश्क़ का जो भी दस्तूर है,
जो तूने दिया वो बुरा ही नहीं।
चले आ रहे हैं उसी राह पर,
जहाँ से कोई लौट आता नहीं।
तेरी बेरुखी का गिला क्या करें,
हमें तो वफ़ा का सिला ही नहीं।
ज़माने के शिकवे करें भी तो क्या,
जब अपना ही कोई सगा ही नहीं।
ख़ुशी की तमन्ना में रोते रहे,
मगर ज़ख़्म दिल का भरा ही नहीं।
चलो ख़त्म करते हैं ये दास्ताँ,
कि आगे कोई रास्ता ही नहीं।
-कमरुन नदाफ