आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दिया तूने जो ग़म, वो मंज़ूर है

                
                                                         
                            दिया तूने जो ग़म, वो मंज़ूर है,
                                                                 
                            
तेरे फ़ैसले में ख़ता ही नहीं।

ग़म-ए-इश्क़ का जो भी दस्तूर है,
जो तूने दिया वो बुरा ही नहीं।

चले आ रहे हैं उसी राह पर,
जहाँ से कोई लौट आता नहीं।

तेरी बेरुखी का गिला क्या करें,
हमें तो वफ़ा का सिला ही नहीं।

ज़माने के शिकवे करें भी तो क्या,
जब अपना ही कोई सगा ही नहीं।

ख़ुशी की तमन्ना में रोते रहे,
मगर ज़ख़्म दिल का भरा ही नहीं।

चलो ख़त्म करते हैं ये दास्ताँ,
कि आगे कोई रास्ता ही नहीं।

-कमरुन नदाफ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
49 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर