कमबख्त आवेश में लेती ज़मीने-दौलतें सारीं
ये क्या कि हमारे अस्तित्व-ए-मिल्कियत ले गयी |
जो निशानी जिन्दगानी-ए-रवानी उन की थी
तॉ उम्र के लिए अदृश्य परिणत और सो गयी
बेहिसाब अस्तित्व, कुछ लम्हों तले
साया मौत-ए-दास्तॉं हो गयी |
अंत मरण माथे पर सज़ा ले आयी थी
त्रासदी से जिन्दगी शून्य कर, समझी वो तर गयी
छीन साया माँ बाप का, तरस मासूम-ए-जान
बस गुमनाम अजनबियों सुपुर्द कर गयी |
ना जाने कौन थी, वो कुरूप रौद्र थी
आफ़त-ए-रूदाली, वीरान -ए-जिंदगी दे गयी
कमबख्त आवेश में लेती ज़मीने-दौलतें सारी
ये क्या कि हमारे अस्तित्व-ए-मिल्कियत ले गयी |