आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ये क्या कि हमारे अस्तित्व-ए-मिल्कियत ले गयी !

                
                                                         
                            कमबख्त आवेश में लेती ज़मीने-दौलतें सारीं
                                                                 
                            
ये क्या कि हमारे अस्तित्व-ए-मिल्कियत ले गयी |

जो निशानी जिन्दगानी-ए-रवानी उन की थी
तॉ उम्र के लिए अदृश्य परिणत और सो गयी
बेहिसाब अस्तित्व, कुछ लम्हों तले
साया मौत-ए-दास्तॉं हो गयी |

अंत मरण माथे पर सज़ा ले आयी थी
त्रासदी से जिन्दगी शून्य कर, समझी वो तर गयी
छीन साया माँ बाप का, तरस मासूम-ए-जान
बस गुमनाम अजनबियों सुपुर्द कर गयी |

ना जाने कौन थी, वो कुरूप रौद्र थी
आफ़त-ए-रूदाली, वीरान -ए-जिंदगी दे गयी
कमबख्त आवेश में लेती ज़मीने-दौलतें सारी
ये क्या कि हमारे अस्तित्व-ए-मिल्कियत ले गयी |


 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर