मिट्टी के आँगन में
पत्थर का खिलौना था,
बेफ़िक्री थी मन में—
वो भी क्या ज़माना था।
वो काग़ज़ की नावें थीं,
वही सपनों का ठिकाना था;
बारिश की बूँदों में
भीगना ही फ़साना था।
न दौलत की चाहत थी,
न शोहरत का तराना था;
दो रोटी, चार दोस्त और
खुशियों का ख़ज़ाना था।
टूटी-सी चप्पल थी,
फिर भी लंबा सफ़र था;
छोटी-सी दुनिया में
हर ख़्वाब मुकम्मल था।
अब ऊँची हैं इमारतें—
क्या यही हमें पाना था?
मिट्टी का वो आँगन…
वो भी क्या ज़माना था।
— कमल किशोर झा