कहाँ से शुरू करूँ मैं अपनी कहानी के किस्से को,
जहाँ से भी समेटने बैठूँ अतीत के इस हिस्से को,
तभी ज़िंदगी का एक नया सफर नया मोड़ ले लेता है,
और मैं पुराने भटकाव में नए रास्तों को अनदेखा कर देता हूँ।
मैं ही मुसाफिर हूँ इस राह का, और मैं ही अपनी मंजिल हूँ,
मेरे ही अश्क हैं इस दरिया में, और मैं ही डूबता साहिल हूँ,
यह गाथा भी मेरी है, यह दास्ताँ भी मेरी है,
इस अनंत ब्रह्मांड में, छिपी एक रूह बस मेरी है।
न जाने कितनी सदियों का बोझ इन आँखों में छुपाए बैठा हूँ,
जो कभी मिल न सका मुझसे, उसे ही अपना बनाए बैठा हूँ,
कोई पूछे जो मेरा पता, तो कह देना बेझिझक उससे,
मैं खुद में ही खोया एक मुसाफिर हूँ, जो खुद को ही ढूँढने निकला हूँ।