जो सब कुछ देख सकती थी, उस रोशन नज़र को तलाश थी,
अजीब है कि रोशनी को ही एक सुनहरी नज़र की तलाश थी।
मेरे लफ़्ज़ तो मुकम्मल थे, पर वो कुछ कह न सके,
भरी महफ़िल में मेरे अल्फ़ाज़ों को एक बेज़ुबां लफ़्ज़ की तलाश थी।
सारे रंग बिखरे पड़े थे मेरे दामन में मगर,
उस बेइंतहा सतरंगी को,एक बेरंग सुरंग रंग की तलाश थी।जो चमक रहा था सबसे ऊँचा, उस शहंशाह के ताज को,
ज़मीन पर धूल में दबे, एक गुमनाम मुक़ाम की तलाश थी।थक कर चूर थी जो, और हार मान चुकी थी,
अजीब ज़िद थी कि उस थकी मेहनत को और मेहनत की तलाश थी।
मैं मौजूद था हर जगह, मेरा नाम हर ज़ुबां पर था,
पर मेरे ही भरे-पूरे वजूद को, अपने ही खोए हुए वजूद की तलाश थी।
-कालू राम सैनी