आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जो सब कुछ देख सकती थी, उस रोशन नज़र को तलाश थी

                
                                                         
                            जो सब कुछ देख सकती थी, उस रोशन नज़र को तलाश थी,
                                                                 
                            
अजीब है कि रोशनी को ही एक सुनहरी नज़र की तलाश थी।
मेरे लफ़्ज़ तो मुकम्मल थे, पर वो कुछ कह न सके,
भरी महफ़िल में मेरे अल्फ़ाज़ों को एक बेज़ुबां लफ़्ज़ की तलाश थी।
सारे रंग बिखरे पड़े थे मेरे दामन में मगर,
उस बेइंतहा सतरंगी को,एक बेरंग सुरंग रंग की तलाश थी।जो चमक रहा था सबसे ऊँचा, उस शहंशाह के ताज को,
ज़मीन पर धूल में दबे, एक गुमनाम मुक़ाम की तलाश थी।थक कर चूर थी जो, और हार मान चुकी थी,
अजीब ज़िद थी कि उस थकी मेहनत को और मेहनत की तलाश थी।
मैं मौजूद था हर जगह, मेरा नाम हर ज़ुबां पर था,
पर मेरे ही भरे-पूरे वजूद को, अपने ही खोए हुए वजूद की तलाश थी।
-कालू राम सैनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर