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इत्र सा

Kalawanti Pareek

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो जब बोलता है, हवाएं खनक उठती है
        
                                                    
                            
वो जब चलता है. जमीं महक उठती है
वो है कुछ इत्र सा, जहां से गुज़रे....
इक ख़ुशबू सी बिखरती है
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे
4 वर्ष पहले
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