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माँ का आँचल...

jayant patel

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जाने कहाँ गए,बचपन के वो पल
        
                                                    
                            
था जहां माँ का,प्यारा वो आँचल

वक्त तू मुझे एक बार वहीं ले चल
जहां मैंने खेले थे, वो खेल सरल
दुआ में माँ का वो , हाथ कोमल
माँ से ही है , घर में चहल पहल
मैं पी गया , ऑफिस रूपी गरल
माँ के आशीष, से जाऊंगा संभल
खोज रहा हूँ , तेरा वो मन निर्मल
तेरा हर बात पर वो भाव निश्छल
क्यों पड़ रही है जिंदगी में ख़लल
नहीं जरूरत , कोई ताज न महल
बस सुना दे , सुंदर वो गीत ग़ज़ल
दरिया जो आवाज करे कल-कल
माँ के प्यारमें लगे न आज न कल
प्रेम वो वात्सल्य, न ठोस न तरल
बहे हरेक जगह,धारा वो अविरल
आंखों में छुपा,है हर बात का हल
मेरे ग़लतियों,परभी कहना कुशल
माँ ही मेरे जीवन,की आय सकल

- जयंत

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