न बोल सके, न सह सके...
बस आँखों में, आशु बहते रहे...
इस तरह इंसानों की दुनिया में जीते रहे...
और ऐसे हर दिन चुपचाप मरते रहे...
न कोई कसूर, न कोई जुर्म है हमारा...
फिर भी मिलता है, यातनाओं का सहारा...
कभी पत्थर, कभी डंडों से पड़ती है मार...
कभी भूख, कभी तड़पती है प्यास से फुहार...
कभी हमारी, आँखों में झाँको तो...
वहाँ पे डर नहीं, प्रेम पाओगे...
अगर समझ पाओ हमारी भाषा...
तो खुद मे इंसान नही, फरिश्ते का रूप पाओगे...
न कभी चाहा तुम्हारा महल...
न माँगा तुम्हारा कोई ताज...
बस दो वक्त की रोटी, और थोड़ा-सा प्यार...
बस यही है इंसानो के लिए, हमारा अपनापन का व्यवहार...
- जतिन कुमार