"प्रतीक्षा ही प्रेम है"
प्रेम का सबसे सुंदर रूप, प्रतीक्षा है,
मिलन तो पल भर का, एक किस्सा है।
मिलन तो उत्सव है, क्षण भर का मेला,
प्रतीक्षा साधना है, हर दिन, हर बेला।
मिलन में धड़कन, शोर मचाती है,
प्रतीक्षा में धड़कन, जाप बन जाती है।
एक ही नाम का, हर साँस जाप करती,
मन की माला पर, उसे ही जपती।
जितनी गहरी हो, ये प्रतीक्षा प्यारी,
उतनी ही गहरी हो, प्रेम की क्यारी।
जितना लंबा हो, ये इंतज़ार सारा,
उतना ही गहरा हो, प्रेम का किनारा।
प्रेम की गहराई, मिल जाने में नहीं,
बाँहों में सिमट, बिखर जाने में नहीं।
प्रेम की गहराई तो, तब दिख पाती है,
जब अनगिनत संध्या, ठहर के जाती है।
जब साथी बिछड़े, देह जब छूटे,
सारे ही बंधन, जग के जब टूटे।
बचता है केवल, यादों का घेरा,
और एकाकी मन, और सूना डेरा।
फिर शुरू होती, अनंत प्रतीक्षा,
न मिलने की आशा, न कोई परीक्षा।
साँस-साँस कहती, अब आओगे कब,
आँखें पूछती हैं, मिल पाओगे कब।
जो इस विरह को, उम्र भर जी जाए,
जो इंतज़ार में ही, जीवन पी जाए।
वही तो प्रेम है, वही तो सच्चा है,
बाकी तो सब, झूठा-कच्चा है।
और यदि यही प्रेम, ईश्वर को दे दो,
विरह को ही अपनी, साधना ले लो।
तो बिछोह भी फिर, योग बन जाता है,
इंतज़ार ही तब, मोक्ष बन जाता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा