"मेरी इच्छा से कुछ नहीं होता"
साँस चल रही है, मेरी मर्ज़ी के बिना,
दिल धड़क रहा है, किसी अर्ज़ी के बिना।
रक्त दौड़ता है, नस-नस में अविराम,
पाचन होता रहता, सुबह-शाम।।
किसने कहा फेफड़ों से, तुम चलते रहो,
किसने कहा दिल से, तुम ढलते रहो।
ऑटोनॉमिक सिस्टम कहता विज्ञान है,
पर इस सिस्टम के पीछे कौन महान है।।
मैं चाहूँ तो हाथ हिला लूँ, पाँव बढ़ा लूँ,
पर चाह कर भी धड़कन को न बढ़ा लूँ।
'मैं' की सीमा है, बस दो-चार कदम तक,
बाकी सब चलता है, उसके ही दम तक।।
बाहर देखो तो, यही खेल सारा है,
पृथ्वी घूम रही, बिना सहारा है।
हवा चल रही, मौसम बदल रहा,
सूरज-चाँद नियम से, नित चल रहा।।
गुरुत्वाकर्षण बाँधे है, सृष्टि को सारी,
मेरी इच्छा से न चले, ये दुनिया प्यारी।
अहंकार कहता, मैं करता हूँ सारा,
पर सच तो ये है, तू है हारा।।
जब कुछ भी होता नहीं, मेरी इच्छा से,
तो कौन चलाता है, इस सृष्टि को इच्छा से।
एक ही उत्तर है, जो भीतर गूँज रहा,
ईश्वर है, वही सबमें, मूँज रहा।।
वही चलाता है, तन को मन को,
वही जिलाता है, कण को जन को।
जब यह बोध जगे, तो कर्म बदलता है,
फल की इच्छा नहीं, निष्काम चलता है।।
क्योंकि करने वाला मैं नहीं, वही है,
मैं तो बस एक जरिया, बहता ही है।
इसी बोध में मुक्ति का सार है,
अहंकार मिटे तो, वही परम द्वार है।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा