"माँ, तू बिना शिकायत चली गई"
जिस माँ ने मुझको जन्म दिया, अपना दूध पिलाया,
मेरी सारी गंदगी को हँस कर गले लगाया।
मैं रोया तो तू जागी, मैं सोया तो तू सोई,
मुझे सूखे में सुलाया, खुद गीले में रही, न रोई।
कभी भूखा न रखा, हर ज़रूरत का ध्यान किया,
अपना आँचल फाड़ कर, मेरा बचपन सिया।
परवरिश ऐसी की, जैसे बगिया को माली सींचे,
हर काँटे से बचाया, हर दुआ में मुझे खींचे।
और आज तू चली गई, बिना कोई शिकायत किए,
बिना उलाहना, बिना बोझ, बस आँखें मूँद लिए।
हम खड़े देखते रहे, हाथ मलते रह गए,
तेरे कर्ज़ के आगे हम, कितने छोटे रह गए।
ये सच है माँ, तेरा ख्याल उतना रख न पाए,
जितनी तुझे ज़रूरत थी, उतना कर न पाए।
पर ये अनिच्छा न थी, ये तो मजबूरी थी,
कभी रोज़गार की दौड़, कभी बच्चों की दूरी थी।
कभी नौकरी की चिंता, कभी समाज के बंधन,
कभी रिश्तों की उलझन, कभी कर्तव्यों के क्रंदन।
समय बँटा-बँटा था, सबमें उलझे रहे,
तेरे आँचल की छाँव को, हम तरसते रहे।
हम चाहते थे माँ, सब तेरा मान करें,
सब मिल कर तेरा, हर दिन सम्मान करें।
पर देर से समझा, अधिकार सिर्फ खुद पर है,
औरों पर कहाँ नियंत्रण, सबका अपना सफर है।
सबके अपने मनसूबे, अपनी-अपनी राहें,
कोई मंज़िल की ओर, कोई चाहों की चाहें।
यही तो जीवन है, यही तो नियति का लेख,
हर कोई लिख रहा अपना, अपना ही आलेख।
तूने सिखाया था जीना, बिना शिकायत जीना,
देना ही देना, कभी न कुछ भी लेना।
आज वही सीख लेकर, मैं सोचता हूँ,
एक दिन मुझे भी ऐसे ही शून्य में खोना है।
बिना शोर के, बिना शिकायत के जाना है,
जैसे तू गई माँ, वैसे ही विलीन हो जाना है।
पर जाने से पहले, तुझसे माफी माँगता हूँ,
तेरे चरणों में माँ, अपना शीश झुकाता हूँ।
- जगदीश प्रसाद शर्मा