"क्षमा - वीरों का आभूषण"
बार-बार भूल हम करते हैं,
और तुझसे ही क्षमा भरते हैं।
पर दूसरों की भूल पर कठोर हो जाते हैं,
खुद क्षमा मांगें, औरों को न दे पाते हैं।
अपनी भूल मानना बड़ी बात है,
पर वेद कहे - क्षमा दान बड़ी साधना है।
क्षमा मांगना तो पहला पायदान है,
क्षमा देना तो ईश्वर का वरदान है।
हे प्रभु, हमें भी क्षमाशील बना दो,
मन के सारे मैल से हमें हटा दो।
जो विचार पकड़ कर हम बैठे हैं,
वो भार तो बस हमारा ही है।
उसके ताप से पहला घर हमारा जलता है,
पहले हमारा ही मन भीतर गलता है।
क्षमा ही चित्त को निर्वैर करती है,
बंधन काट, हमें मुक्त करती है।
अथर्व कहता - मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षत्,
भाई भाई से द्वेष न करे, यही तो है हित्।
बहन बहन से बैर न धारे,
द्वेष रहेगा तो क्षमा कैसे सारे?
यजुर्वेद कहता - मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे,
सबको मित्र दृष्टि से देखो, यही कहे।
मित्र की दृष्टि ही तो क्षमा है,
और क्षमा ही तो प्रभु की प्रभा है।
सुनो, क्षमा दुर्बलता नहीं होती,
ये कायरों के मन में नहीं सोती।
क्षमा वीरों का आभूषण कहलाती है,
कायर की तो तलवार ही कहलाती है।
क्षमा का अर्थ अन्याय भूलना नहीं है,
अन्याय को सह जाना भी नहीं है।
न्याय तुझको सौंप, चित्त पवित्र रखना है,
खुद को क्रोध की अग्नि से बचना है।
इसलिए हे न्यायकारी, सुन मेरी बात,
हमें भी दे दो समदर्शी जज़्बात।
हम औरों के दोष भूल जाएं,
अपने दोष याद रख, सुधर जाएं।
जो शत्रु लगे, उसे भी आत्म समान जानें,
सबमें तेरा ही रूप पहचानें।
द्वेष रहित एक सहृदय मन दे दो,
सबके लिए करुणा का धन दे दो।
कोई कठोर बोले तो हम मौन धरें,
कोई द्वेष करे तो करुणा न छोड़ें।
कोई छल करे तो तेरे न्याय पर छोड़ें,
कर्मफल तो प्रभु, तुम ही तोड़ें-मोड़ें।
हम न्यायाधीश न बनें, पूर्वाग्रह वाले,
बनें साक्षी मात्र, अभय संभाले।
हे ईश्वर, हमें क्षमावान बना दो,
मुक्त करो, निर्वैर महान बना दो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा