साथी साथ छोड़कर, चले तो जाते हैं,
पर उनकी यादें, उम्र भर रह जाती हैं।
अब शिकायत किसी से, बची नहीं मन में,
एक बोध जगा है, गहरे इस जीवन में।
यदि साथी देह था, तो जाना निश्चित था,
देह तो नश्वर है, मिटना निश्चित था।
पर यदि साथी आत्मा, अजर-अमर है,
तो उसकी मृत्यु कहाँ, वो यहीं अमर है।
वो मरा नहीं, बस रूप बदल गया है,
किसी और स्वरूप में, यहीं ढल गया है।
प्रेम कभी बंधन में, बांधता नहीं,
वो तो बंधनों से, मुक्त करता ही।
ये अपना शरीर भी, अपना कहाँ रहता है,
बचपन, जवानी, बुढ़ापा, बदलता रहता है।
पर आत्मा तो अंश है, उस विराट ब्रह्म का,
टूट सकता नहीं, रिश्ता कभी उस रम का।
हम सब उसी के, ही तो अंश हैं,
एक ही दीप के, कई वंश हैं।
तो फिर सोचो, जाने वाला गया कहाँ,
वो गया नहीं, है यहीं, इसी जहाँ।
हवा में, खुशबू में, यादों में बसा है,
मेरे ही मन के, एक कोने में हँसा है।
वो कहीं नहीं गया, यही तो ज्ञान है,
यही प्रेम का, अंतिम निर्वाण है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा