नहीं दो हैं यहाँ, एक ही विस्तार है,
आत्मा ही ब्रह्म है, यही तो सार है।
भेद-दृष्टि भ्रम है, माया का जाल है,
एक चैतन्य ही तो, सकल में निहाल है।।
तू नहीं देह, न मन, तू तो ब्रह्म-स्वरूप है,
तेरे ही प्रकाश से, जगत का रूप है।
जैसे लहरें उठें, सागर एक ही रहता,
वैसे ही जगत दिखे, पर ब्रह्म एक ही बहता।।
द्वैत को जो देखे, वो अज्ञान में पड़ा है,
अद्वैत को जो जाने, वो मुक्ति से जड़ा है।
न तू छोटा, न बड़ा, तू असीम आकाश है,
तेरे ही भीतर गूँजता, अनहद का प्रकाश है।।
यह उपदेश सीधा है, घुमाव नहीं कोई,
सत्य यही अंतिम है, दूजा भाव नहीं कोई।
मैं और तू का भेद मिटा, जब एक को जाना,
तभी अष्टावक्र ने, जनक को पहचाना।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा