धर्म का आईना, चार वेद प्यारे हैं,
मानवता के पथ के, चार सहारे हैं।
ईश्वर की वाणी, ऋषियों ने गाई है,
तभी तो सृष्टि में, रोशनी आई है।
*पहला ऋग्वेद है, ज्ञान का भंडार,*
दस हजार मंत्रों का, दिव्य संसार।
अग्निमीळे पुरोहितं, यज्ञ की ज्वाला है,
सत्य सनातन धर्म की, पहली माला है।
कहता है सब प्राणी, एक पिता की संतान,
वसुधैव कुटुम्बकम्, यही वेदों का ज्ञान।
*दूसरा यजुर्वेद है, कर्म का दर्पण,*
जीवन को यज्ञ बनाओ, यही है अर्पण।
कर्म से ही जीवन, पवित्र होता है,
यज्ञमय जीवन ही, मित्र होता है।
ईशा वास्यमिदं सर्वं, यही सिखाता है,
हर कण में ईश्वर है, यही बताता है।
*तीसरा सामवेद है, भक्ति का गान,*
सुर लय और संगीत का, मधुर विधान।
ऋचाओं को गाकर, मन को झुमाता है,
ईश्वर के चरणों में, शीश झुकाता है।
संगीत से आत्मा, शुद्ध हो जाती है,
भक्ति की धारा, हृदय में बहती है।
*चौथा अथर्ववेद है, जीवन का विज्ञान,*
रोग औषधि यंत्र का, सच्चा ज्ञान।
जड़ी-बूटी से लेकर, राष्ट्र धर्म तक,
परिवार से लेकर, ब्रह्म मर्म तक।
शांति पुष्टि सबका, इसमें सार है,
मानव कल्याण का, यही आधार है।
चारों वेद कहते, एक ही बात,
सत्यमेव जयते, धर्म की है जीत।
न कोई ऊँचा-नीचा, सब एक समान,
आत्मवत् सर्वभूतेषु, यही है ज्ञान।
वेदों का आईना, जब देखोगे,
अपना ही चेहरा, तुम पहचानोगे।
वेद पढ़ो तो, धर्म समझ आए,
जीवन का हर अंधेरा, मिट जाए।
- जगदीश प्रसाद शर्मा