विज्ञापन

कब चश्मा चाहिए, कब पैर दबाना है।

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माँ-बाप का सहारा बेटा होता है, ये सब कहते हैं,
        
                                                    
                            
बेटी भावुक है, आखिर तक साथ रहती है, ये भी कहते हैं।
बेटा कमाता है, समय नहीं होता उसके पास,
मन साफ है फिर भी, कर नहीं पाता कुछ खास।

ये तर्क-वितर्क तो घर-घर में चलते हैं,
अपने-अपने तर्क सभी को खलते हैं।
पर जो समझदार हैं वो सच जानते हैं,
भीतर की बात वो ही पहचानते हैं।

बाहर से बेटा सहारा लगता है,
भीतर का सच बहू से जगता है।
माँ को कब दवा चाहिए, बाबूजी को क्या खाना है,
कब चश्मा चाहिए, कब पैर दबाना है।

ये छोटी-छोटी बातें कोई नहीं जानता,
बेटे का ध्यान इस ओर नहीं जाता।
ये सब व्यवस्था एक बहू ही करती है,
बिन कहे सब जरूरतें पूरी करती है।

बेटा घर लाता है, बहू घर बनाती है,
सास-ससुर के बुढ़ापे को गले लगाती है।
इसीलिए कहता हूँ, बहू ही असली सहारा है,
वही तो इस घर का सच्चा किनारा है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile