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कब चश्मा चाहिए, कब पैर दबाना है।

                
                                                         
                            माँ-बाप का सहारा बेटा होता है, ये सब कहते हैं,
                                                                 
                            
बेटी भावुक है, आखिर तक साथ रहती है, ये भी कहते हैं।
बेटा कमाता है, समय नहीं होता उसके पास,
मन साफ है फिर भी, कर नहीं पाता कुछ खास।

ये तर्क-वितर्क तो घर-घर में चलते हैं,
अपने-अपने तर्क सभी को खलते हैं।
पर जो समझदार हैं वो सच जानते हैं,
भीतर की बात वो ही पहचानते हैं।

बाहर से बेटा सहारा लगता है,
भीतर का सच बहू से जगता है।
माँ को कब दवा चाहिए, बाबूजी को क्या खाना है,
कब चश्मा चाहिए, कब पैर दबाना है।

ये छोटी-छोटी बातें कोई नहीं जानता,
बेटे का ध्यान इस ओर नहीं जाता।
ये सब व्यवस्था एक बहू ही करती है,
बिन कहे सब जरूरतें पूरी करती है।

बेटा घर लाता है, बहू घर बनाती है,
सास-ससुर के बुढ़ापे को गले लगाती है।
इसीलिए कहता हूँ, बहू ही असली सहारा है,
वही तो इस घर का सच्चा किनारा है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

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