राज्यसभा में जब, कृष्ण का मान घटा,
दुर्योधन के मद ने, मर्यादा को रौंदा था।
शांति का दूत जब, अपमानित होकर निकला,
तभी तो महाभारत का, बिगुल निश्चित बजा था।
क्रोध में भरकर दुर्योधन, विदुर द्वार पर आया,
नीति के ज्ञाता को, खरी खोटी सुना गया।
कहा - तुम पांडवों के, सदा पक्षधर हो,
इस कुरु वंश में, तुम तो नौकर भर हो।
सुनकर वचन कठोर, विदुर आहत हुए,
धर्म के दीपक से, जैसे आह हत हुए।
बोले - अब बहुत हुआ, मैं युद्ध से अलग हूँ,
इस अधर्मी सभा से, मैं सदा विलग हूँ।
कृष्ण के जाते ही, विदुर राजभवन आए,
धृतराष्ट्र के कक्ष में, व्यथा लेकर आए।
बोले - हे महाराज, अब मुझे मुक्त करो,
इस महामंत्री पद से, मुझे विरक्त करो।
यह रहा त्यागपत्र, मुकुट भी लो संभाल,
अब न दूंगा मैं, इस राज को मशाल।
धर्म जब हार गया, तो पद का क्या काम,
अब तो वन ही भला, और राम ही राम।
धृतराष्ट्र ने सुना, आँखें भर आईं,
अंधी आँखों में भी, ममता उमड़ आई।
असहमत था विदुर से, सदा हर बात में,
पर प्रेम तो बसा था, भाई के जज़्बात में।
बोले - विदुर सुनो, एक बात मेरी,
महामंत्री से त्याग, मंजूर है तेरी।
युद्ध से विलग होना, मंजूर है तेरा,
पर क्या भाई से भाई, विलग होगा मेरा?
यह मुकुट मत रखो, मेरे इस कक्ष में,
इसे पहनकर ही जाओ, भाई के पक्ष में।
पद तो तुमने छोड़ा, रिश्ता तो नहीं छोड़ा,
भाई का बंधन तो, कभी नहीं तोड़ा।
यह भाई का प्रेम था, सबसे ऊँचा मान,
जहाँ पद छोटा था, रिश्ता था महान।
इसी प्रेम ने तो, इतिहास रचाया था,
महाभारत के बाद भी, साथ निभाया था।
जब कुरुक्षेत्र में, सब शव पड़े थे,
भतीजों की लाशों पर, कौरव अड़े थे।
तब धृतराष्ट्र के पास, विदुर ही बैठे थे,
आँसू बनकर उनके, दुख को समेटे थे।
और अंत में जब, राजा वन को गया,
अंधा धृतराष्ट्र जब, सब कुछ खो गया।
तब भी विदुर ने, साथ नहीं छोड़ा,
भाई के संग ही, वन का रुख मोड़ा।
पद तो छूट जाता है, मुकुट गिर जाते हैं,
रिश्ते ही तो हैं जो, अंत तक निभाते हैं।
महाभारत यही तो, हमें सिखाता है,
भाई का मुकुट, भाई ही पहनाता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा