विज्ञापन

गौरी और झुमकी

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सजी-धजी थीं दो बकरियाँ,
        
                                                    
                            
एक थी गौरी, दूजी झुमकी,
गले में फूलों की माला थी,
माथे पर चमक रही थी बिंदी।

मंदिर की घंटियाँ बजती थीं,
धूप की खुशबू आती थी,
दोनों एक-दूजे को देख रही थीं,
मन में हलचल छाती थी।

गौरी बोली—
“झुमकी री! मुझे सजा रहे हैं,
फूलों की माला पहना रहे हैं,
माथे पर टीका लगा रहे हैं,
पर कुछ तो बात छिपा रहे हैं!”

झुमकी बोली—
“गौरी बहना! तू डरती क्यों है?
आँखों में आँसू भरती क्यों है?
मंदिर है, पूजा-पाठ है,
फिर मन में आशंका धरती क्यों है?”

गौरी बोली—
“सुबह तलक तो घास चर रही थी,
अपने बच्चों संग हँस रही थी,
अब ये माला, ये टीका क्यों है?
क्यों मेरी धड़कन बढ़ रही है?”

झुमकी ने धीरे से पूछा—
“गौरी! तुझे कुछ आभास हुआ क्या?
किसी ने तुझसे कुछ कहा क्या?”

गौरी ने काँपती आवाज़ में कहा—
“उधर देख... कुछ लोग खड़े हैं,
चेहरों पर गंभीरता धरे हैं,
कोई पूजा की थाली लाया,
कोई हाथ में कुछ पकड़े खड़ा है...”

घंटियाँ थोड़ी तेज़ बजती हैं,
ढोल की थाप सुनाई देती है,
गौरी झुमकी से सटकर कहती—
“देख री! कोई तलवार लिए आता है...”

झुमकी सहमकर पीछे हटती है—
“तलवार...? मगर क्यों बहना?
हमने किया है आखिर क्या?”

गौरी बोली—
“हमने तो किसी का कुछ नहीं छीना,
न किसी को दुख दिया,
घास खाई, दूध दिया,
फिर ये कैसा न्याय किया?”

तभी एक इंसान आगे आता है—
हाथ में चमकती तलवार लिए,
दूसरा इंसान पूजा का भाव लिए,
हाथ से जल का छिड़काव किए।

गौरी उसे देखकर पूछती है—
झुमकी रे। “इनके भी घर में बच्चे होंगे,
इन्हें दर्द तो समझ आता होगा,
क्या इनके बच्चे भी तलवार से कटते होंगे”

झुमकी बोली—
“जिस भगवान को ये पूज रहे हैं,
क्या वो खून से खुश होंगे?
जिसके नाम पर दीप जला रहे,
क्या वो किसी की साँस छीनेंगे?”

गौरी की आँखों में आँसू थे,
पर आवाज़ में विश्वास था—
“फूल चढ़ाओ, दीप जलाओ,
मन में सच्ची श्रद्धा लाओ,
पर जिस जीवन को ईश्वर ने भेजा,
उस जीवन को मत मिटाओ।”

इंसान जो थे खड़े।
शायद सुन नहीं पाए।

गौरी और झुमकी की बातों से
किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगी।
मंदिर की घंटियाँ बजती रहीं,
और हो रहा था साथ में मंत्रों का उच्चारण।

गौरी ने झुमकी को देखा,
आँखों में आँसू भर आए—
“झुमकी री! लगता है बहना,
हमारे दिन अब कम रह गए...”

झुमकी बोली—
“चुप मत हो गौरी, हिम्मत रख,
शायद कोई हमें बचा ले,
शायद किसी इंसान के भीतर
सोया इंसान जाग जाए।”

तभी एक आदमी आगे बढ़ा,
हाथ में तलवार उठाई,
गौरी ने आँखें बंद कर लीं,
झुमकी ने गर्दन झुका ली।

फिर गौरी ने आँखें खोलीं—
धीरे से इंसान को देखा,
और आखिरी बार पूछा—

“भैया! एक बात बताना,
तुम्हारे घर में माँ होगी?
तुम्हारे बच्चे भी होंगे?
अगर उनके गले में माला डालकर
कोई तलवार लेकर आए,
तो क्या तुम चुप रहोगे?”

आदमी ठिठक गया...
हाथ में तलवार थी,
लेकिन हाथ काँपने लगा।
पहली बार लगा कि इंसान
सुनता भी है।

मंदिर में घंटियाँ बजती रहीं,
और उसके भीतर कुछ टूटने लगा।

गौरी फिर बोली—
“हम माँ हैं...
हमारे बच्चे हैं...
हमारे भीतर भी साँसें हैं,
जैसे तुम्हारे भीतर।”

कुछ पल सन्नाटा रहा...

फिर वह आदमी
तलवार नीचे रख देता है।
पूजा की थाली वहीं रखकर
गौरी की ओर देखता है और कहता है—

“आज समझ आया...
भगवान को चढ़ावा नहीं,
हमारे भीतर की दया चाहिए।”

झुमकी की आँखों में चमक आई,
गौरी के चेहरे पर मुस्कान आई,
बाकी भीड़-
मौन, स्तब्ध।

और फिर दोनों बकरियाँ
मंदिर के आँगन से बाहर निकल गईं...
पीछे रह गई
फूलों की माला,
पूजा की थाली
और एक सवाल—
**“अगर जीवन ईश्वर ने दिया है,
तो उसे लेने का अधिकार
इंसान को किसने दिया?”**

मंदिर की घंटियाँ बजती रहीं...
दीपक अपनी लौ जलाता रहा...
लेकिन उस दिन
मंदिर में भगवान की पूजा से ज्यादा
इंसानियत की पूजा हुई।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7172 कविताएं

View Profile