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बीर-नारी की पुकार

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माथे की हर बिन्दी को निकाल मैं तिरंगा बना देती।
        
                                                    
                            
बीर-नारी की क्या है पुकार? दुनिया को जता देती।

पसीना अंग-अंग हो जाता तो मैं नहा लेती।
खबर जंग की हो, तो दिल से मन को मना देती।

अवकाश खत्म होने से पहले जब जाते देखती।
रोती नहीं थी तब जरा सा मुस्करा देती।

तो तुम ही बताओ कैसे मैं उनको मायूस कर देती।
पलट कर अपने कमरे में आंसू बहा देती।

देश की पुकार पर फिर मैं बेटे भेज देती।
अपना धर्म यही समझकर आंसू छिपा देती।

अखबार या समाचार मे खबर जब देखती।
शत्रु ढेर हो गए, ये दुनिया को बता देती।

रोम-रोम पुकारे स्मारक जब उनका मैं देखूं।
शहीद होकर काश, मैं भी अपना खून बहा देती।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
2 महीने पहले
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