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'शांति सेना के संस्मरण'

jagdish bhandari

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                            'मेरा दोस्त, चपाती देगा',
        
                                                    
                            
बस यही आवाज गूंजती थी।
कांगो देश के दुर्गम गांवों की
हालात बड़ी दयनीय थी।

हिंदी भाषा से अनभिज्ञ थे,
फिर भी कुछ शब्द रटे थे वो।
'मोनिके-मोनिके' कहकर हमें,
देखते ही चिल्लाते थे वो।

जब कभी भी दिखते हमें तो,
कुछ खाने की मांग करते थे।
गाड़ियों के पीछे दौड़-दौड़कर,
कई मील चले आते थे।

और नहीं कुछ जिद थी उनकी,
रोटी मिल जाए तो खुश थे वो।
दिनभर कैंप के इर्द-गिर्द हमारे,
बस यूं ही घूमते रहते थे वो।

बच्चों की थी भीड़ वहां पर,
बच्चे ही नजर आते थे वहां।
एक परिवार में आठ-दस बच्चे,
इनके लिए सामान्य बात थी वहां।

हिंदी भाषा से अनभिज्ञ थे,
फिर भी कुछ शब्द रटे थे वो।
'कैसा है दोस्त' वो बोलते थे तो,
'बढ़िया हैं,' हम भी कह देते थे।

खनिज संपदा का भंडार वहां,
मौसम भी था सदाबहार वहां।
नहीं होता था पतझड़ वहां पर,
सदा रहती थी हरियाली वहां।

'शांति सेना' का हिस्सा बनकर,
वहां की सरजमीं पर आए थे।
सफल रहे यू.एन. मिशन हमारा,
बस यही दुआ हम करते थे।
- जगदीश भंडारी
एक महीने पहले
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