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मन की बेड़ियाँ

Jaan Bharat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपनी बेड़ियाँ खोल दे
        
                                                    
                            
ये बेड़ियाँ कुछ भी नहीं,
बस मन की उपज हैं—
मनुष्य के मस्तिष्क की कल्पनाएँ,
जो कड़ियाँ जोड़ती जाती हैं
और मानव को जकड़ती जाती हैं,
कहती हैं—
“इस राह से भटक जा,
अपने कदम रोक ले,
तू आगे नहीं बढ़ सकता।”
पर क्या यही मनुष्य की सीमा है?
या फिर इसी सीमा को लाँघ जाने का
नाम है अदम्य साहस?
हर मनुष्य को चाहिए
वह साहस,
जो उसे मानवता के पथ पर
अडिग होकर चलना सिखाए।
राही अक्सर राहों में भटक जाते हैं,
और राह में पड़े काँटों को
‘बेडियों’ का नाम दे देते हैं।
पर क्या वे नहीं जानते—
संसाधनों की कमी
कब किसी के कदम रोक पाई है?
ऊँचे लक्ष्य
जीवन से माँगते हैं
एक कठिन उड़ान।
पर उड़ान की ऊँचाई
पंखों की ताकत से नहीं,
हौसलों की ऊँचाई से तय होती है।
हाथी में महावत से कहीं अधिक ताकत होती है,
फिर भी वह उसकी लगाम मान लेता है।
क्या कभी तुमने सोचा है—
उसे बाँधने वाली रस्सी
वास्तव में कितनी मजबूत होती है?
अक्सर जंजीरें लोहे की नहीं होतीं,
वे हमारे मन में पड़ी होती हैं।
इसलिए—
तू भी अपनी बेड़ियाँ खोल दे,
अपने दिल में पड़ी
हर जंजीर को तोड़ दे।
लक्ष्य तुझे बुला रहा है, राही,
तेरे कदमों की आहट सुन रहा है।
उठ—
और अपनी राह स्वयं बना।
किसी के सहारे की प्रतीक्षा मत कर,
तू स्वयं किसी की उम्मीद बन,
किसी के अँधेरे में
एक दीपक बनकर जल।
राहें बंद नहीं हैं—
बस तू अपनी बेड़ियाँ खोल दे।
एक घंटा पहले
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