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नफ़ासत

Islam Ali

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इन धड़कनों की ज़बाँ में कोई असर तो हो,
        
                                                    
                            
हर इक सदा में थोड़ा सा आपका स्वर तो हो।
सन्नाटों की भी आवाज़ बन जाए कोई,
ख़ामोश लम्हों में बस प्यार बोलिए।
अल्फ़ाज़ में ज़रा सी नफ़ासत भी घोलिए...

काग़ज़ पे बस न उतरें ये दिल की दास्ताँ,
लबों से छलक उठे हर इक दुआ का ग़ुलिस्ताँ।
जैसे घटाओं में छुप जाए दर्द की रौशनी,
उम्मीद की कोई रौ, फिर से खोलिए।
अल्फ़ाज़ में ज़रा सी नफ़ासत भी घोलिए...

न सिर्फ़ शेर कहिए, न सिर्फ़ गीत रचिए,
कुछ आँसुओं की मिठास भी साथ रखिए।
हर मिसरे में हो सच्चाई का नम रहम,
हर शेर में दिल की गहराइयाँ तोलिए।
अल्फ़ाज़ में ज़रा सी नफ़ासत भी घोलिए...

इक झलक में मिले वो सदियों की तर्जुमानी,
हर दर्द को दे दीजिए नर्म-सी रवानी।
जहाँ तल्ख़ियों का बाज़ार गर्म हो,
वहाँ बस मुहब्बत का मौसम बोलिए।
अल्फ़ाज़ में ज़रा सी नफ़ासत भी घोलिए...
-इस्लाम अली
एक वर्ष पहले
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