नई कोई बात करु या कि पुरानी लिख़ दूं।
बात सच्ची कहूं या कोई कहानी लिख़ दूं।।
हो तजुर्बे का ज़िक्र या कि हुस्न का चर्चा।
जाईफी अपनी लिखूं या तेरी जवानी लिख दूं।।
जिसके साए में ये सुकून मिला है मुझको ।
उनको जुल्फें कहूं या शाम सुहानी लिख़ दूं।।
गुल ओ बहार के मौसम में आप आए हैं।
ज़िक्र आंचल का हो या हवाओं की रवानी लिख़ दूं।।
अगर शोहरत है तो रुसवाईयां भी
मुमकिन हैं।
नाम पूरा लिखूं या सिर्फ़ निशानी लिख़ दूं।।
आज सच में ही पशोपेश में है ये "मेंहदी"।
बात दानाई की करूं या नादानी लिख़ दूं।।
-इक़बाल मेंहदी काजमी