विज्ञापन

विस्तार का सार

Ipsita Bhadauria

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुट्ठी में रेत सा, ये मन फिसल रहा है ।
        
                                                    
                            
सब शोर वो छोड़कर ,एकांत चुन रहा है।
कल -परसों मे बीते , जो पल पल तुम्हारे
छङ -छङ में बस ये, जीवन निकल रहा है ।
जीवन निकल रहा है ,तो हम कहां खड़े हैं
कैसे इसे मैं बांधू, इस सोच में पङे हैं।
हम भले खङे हों, समय तो चल रहा है।
विस्तार का है सार कल मेरा वही है , जो मैने आज कर दिया है।
सार से जो तुमको भय नहीं है , तो जो निकल रहा है वो समय नही है।
तुम जी रहे जिन्दगी को , जिन्दगी तुम्हे नही है ।
11 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12711 कविताएं

View Profile

Vijay BindaasRaja

192 कविताएं

View Profile