मुट्ठी में रेत सा, ये मन फिसल रहा है ।
सब शोर वो छोड़कर ,एकांत चुन रहा है।
कल -परसों मे बीते , जो पल पल तुम्हारे
छङ -छङ में बस ये, जीवन निकल रहा है ।
जीवन निकल रहा है ,तो हम कहां खड़े हैं
कैसे इसे मैं बांधू, इस सोच में पङे हैं।
हम भले खङे हों, समय तो चल रहा है।
विस्तार का है सार कल मेरा वही है , जो मैने आज कर दिया है।
सार से जो तुमको भय नहीं है , तो जो निकल रहा है वो समय नही है।
तुम जी रहे जिन्दगी को , जिन्दगी तुम्हे नही है ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X