जिन्हें छूने को कुंडी, अभी एड़ी उठानी पड़ती है,
उन्हें महफ़िल में शेरों जैसी दहाड़ लगानी पड़ती है।
जो खुद परछाई से डरकर, कमरा बंद कर लेते हैं,
अंधेरी रातों में वो अक्सर, तलवारें तान लेते हैं।
अरे! गोद से उतरी नहीं जिनकी अभी नादानियां,
वो महफ़िल में सुनाते हैं, सिकंदर की कहानियां।
बहादुरी का ज़िक्र ऐसे, वो सरेआम करते हैं,
कि जैसे मौत से वो रोज़, कोई काम करते हैं।
मगर जब वक़्त की चौखट पे, कोई इम्तिहान आता है,
तो पिंजरे का वो तोता, अपनी औकात पे आ जाता है।
बड़ी बातें बनाना तो, बहुत आसान है प्यारे,
मगर जब जंग लड़नी हो, तो बुझ जाते हैं अंगारे।
ज़रा कद को बढ़ाओ पहले, फिर तुम बात करना,
बिना औकात के, यूं शेर से ना घात करना।
ये दुनिया देखती है सब, तमाशा मुस्कुरा कर,
कि चूहे चल दिए हैं आज, बिल्ली को डरा कर!