मंजुल मंजुल देखि परै सिगरी वसुधा तन पै हरियाली।
धानन का रँग पीत हुआ जनु स्वर्ण छटा छिटकी मतवाली।
है सरदी गरमी गबड़ी नभ में दिन रात दिखै उजियाली।
मारग सूखि गए सब ही मिटि गै बरिखा कचड़ा बदहाली।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'