बरखा गई है आई शरद परव लेके, नर-नारी बाल-वृद्ध में चढ़ी उमंग है।
पुरखों को जल देके माई के स्वरूप पूजे, दशहरा ने जगाई भक्ति अंग अंग है।
उल्लुओं का पूजन दीपावली गोवरधन, भाईदूज को मनाया खुशियों के संग है।
बुड़की के मेला तक सब हैं संगीन हुए, श्वान सिरों तक पे चढ़ा हुआ अनंग है।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'