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कुचल के मेरा बचपन

Himanshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलो मान लिया अभी अच्छे बुरे की पहचान नही मुझमे
        
                                                    
                            
पर नादानी इतनी भी नही की तेरे स्पर्स की ना पहचान मुझमे

जो कली खिली भी नही वो भी मुर्झायी है क्यू मेरे बचपने को आग तुने लगायी है
क्यूं तझे शर्म नही आयी तेरे शर्मनाक इरादो से मेरी तो रूह भी शर्मायी है

पहन के मुखोटा अछायी का जो तू आजाद मेरे सामने घूम रहा
आज भी मेरे जहन मे उन चीखो का शौर निरंतर गूँज रहा

कुचल के मेरे बचपन के सपने नींद कैसे तुझे आयी है
गुड़िया के साथ खेलने की उंम्र मे आज मुझे मेरी परछायी से भी नफरत हो आयी है

अब तो कूदरत से भी मेरी लड़ाई है क्यू ऐसे जहान मे मुझे
साँस आयी हैं
जहा मेरी मासूमियत से ज्यादा हवस की सुनवाई हैं
2 वर्ष पहले
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Prasoon Saxena

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