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कुचल के मेरा बचपन

                
                                                         
                            चलो मान लिया अभी अच्छे बुरे की पहचान नही मुझमे
                                                                 
                            
पर नादानी इतनी भी नही की तेरे स्पर्स की ना पहचान मुझमे

जो कली खिली भी नही वो भी मुर्झायी है क्यू मेरे बचपने को आग तुने लगायी है
क्यूं तझे शर्म नही आयी तेरे शर्मनाक इरादो से मेरी तो रूह भी शर्मायी है

पहन के मुखोटा अछायी का जो तू आजाद मेरे सामने घूम रहा
आज भी मेरे जहन मे उन चीखो का शौर निरंतर गूँज रहा

कुचल के मेरे बचपन के सपने नींद कैसे तुझे आयी है
गुड़िया के साथ खेलने की उंम्र मे आज मुझे मेरी परछायी से भी नफरत हो आयी है

अब तो कूदरत से भी मेरी लड़ाई है क्यू ऐसे जहान मे मुझे
साँस आयी हैं
जहा मेरी मासूमियत से ज्यादा हवस की सुनवाई हैं
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2 वर्ष पहले

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