चलो पुकारे तुम्हें महाबा, कर्ज चुकाना बाकी है
जिसके जल से अन्न हुआ था, उसे बचाना बाकी है ।
नदियां है धरती की घड़कन, जिनसे जीवन चलता है
जल है तो जीवन का पल है, बरना प्राण निकलता है हम हैं हलधर,
भूखे पुजा री, कृषि हमारी पूजा है नदियां हैं हम सबकी माता और नहीं कुछ दूजा है
धरती मां के लाल सुनों, अभी फर्ज तुम्हारा बाकी है
चलो पुकारे तुम्हें महाबा कर्ज चुकाना बाकी है ।।
नदियों वाली धरती पर खुशियों का सरगम बहता है
हरियाली का आंचल देखों, कितना प्यारा लगता है अमिट सभ्यंता के पहिये,
बस उन राहों पर चलते हैं जल का आदर करने वाले जिन देशों में बसते हैं
फिर से मिलकर साथ चलो अभी मर्ज पुराना बाकी है
चलो पुकारे तुम्हेंभ महाबा कर्ज चुकाना बाकी है ।।
मेरे दादा-परदादा ने महाबा की लहरें देखी
चलते फिरते इन नदियों में गंगा की मूरत देखी,
सहस्र पीढि़यां हो गई स्वागहा, गंगा जी को लाने में
गंगा की बेटी है महाबा, खो रही अनजाने में
उठो भागीरथ, देखो फिर से यत्न तुम्हारा
बाकी है चलो पुकारे तुम्हें महाबा कर्ज चुकाना बाकी है ।।
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