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बचपन की यादें

harinder yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ठण्डी ठण्डी हवा चली जब
        
                                                    
                            
यादोंं की बारात लगी तब
यादों मे फिर बचपन लौटा
रेत भरी गलियों में लेटा

काले काले बादल आए सज कर
पानी का कटोरा भर कर
कटोरे को उल्टा कर के
जग को पानी से भर के
फिर बारिश में दौड़ा मैं करता छप छप
संग में कागज की नांव मकोडे भर कर

बचपन मेंं ही सच्ची मस्ती होती हैं
एक तरफ माई तो
दूसरी तरफ दोस्तों की टोली होती हैं
टोली के संग निकला नाहने
मर जाऐगी अलाई इसी बहाने

जब खडे़ हुए जोहड़ की ताल पर
जैसे तैरे जलचर के अहसास पर


अब नहीं रही बारिश की वो बूदें
नही मिलती अब वो मस्ती भी ढूढें
अब चारों तरफ बस दिखावा हैं
यह संसार तो बस एक छलावा है


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6 वर्ष पहले
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sushil pandey

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